परमपिता सुन अरज पधारो, आपने हाथ अब दास उबारो
चरण कमल तोहरे बस जावै, मनवांछित फल तुमसे पावै।।
निर्मल मन कर, अपना कीजै, अनंत काल सुख मोहे दीजै।
तुम हो मोर वीर पतवंता, शरण में ली जो मोहे अनंता।।
राम शरण का दास कहावो, मनवांछित फल तुमते पावो।
जोहि जन तोरा यश गावै, ज्ञान दीप अब मन में जगावै।।
हे नाथ! तुमको हो समर्पण, मन, तन-धन सब तुमको अर्पण।
बल, बुद्धि, विद्या के स्वामी, कृपा करो हे उर अंतर्यामी।।
तुम बिन आस नहीं अब कोये, शरण तेरी मन दर्शन होये।
राम नाम गावो मन साजो, अन्तर मन में आन विराजो-
॥ ॐ सिया रामाय नमः ॥