प्रस्तावना
भक्ति, भारतीय आध्यात्मिक परंपरा का न केवल एक आधारस्तंभ है, बल्कि यह मानव चेतना की उस अवस्था का प्रतिनिधित्व करती है जहाँ भावना, संज्ञान और क्रिया का एकीकरण होता है। संस्कृत मूल 'भज्' धातु से व्युत्पन्न, जिसका अर्थ है "सेवा करना", "साझा करना" या "जुड़ना", भक्ति शब्द एक ऐसी प्रक्रिया को इंगित करता है जिसमें भक्त और भगवान के बीच एक गहरा, व्यक्तिगत और पारस्परिक संबंध स्थापित होता है.
"सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।"
- नारद भक्ति सूत्र
अर्थात: भक्ति ईश्वर के प्रति परम प्रेम रूपा है।
यह केवल बाह्य पूजा अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, अपितु यह ईश्वर के प्रति सर्वोच्च और निस्वार्थ प्रेम की अभिव्यक्ति है।